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Friday, April 8, 2011

माँ सभी शब्दों का सार

माँ सभी शब्दों का सार
या फिर शब्दकोश से भी बाहर
की कोई बेहद आत्मीय ध्वनि
जो बार बार मुँह से निकल आता है
और जो समझती है
हर पीड़ा को, हर दु:ख को


माँ-धरती है
जो अपनी छाती पर उगाती है
जीवन को
और उड़ेल कर दे देती है
अपने भीतर से सब कुछ
लो, ये तुम्हारे लिए है
तुम जियो और फलो-फूलो
मैं तुम्हारी माँ हूँ


माँ-घर की छत है
धूप-छाँव और बारिश से लड़ती छत
रिश्तों को गांठ लगाए
बाँध कर रखती है सीमाओं में
आखिर माँ ही तो आंगन है
माँ रसोई भी तो है
इस चिंता में जागती है
कहीं कोई भूखा तो नहीं है


माँ सब जगह है
आंगन में झाड़ू लगाती
गमलों में पानी देती
कपड़े धोती, कपड़े सिलती
रसोई की खटर-पटर में उलझी
खर्चे-पानी के हिसाब में डूबी
बच्चों के बालों को संवारती
किताबों के प्रश्नों और उत्तरों
को फिर से जीती
कभी गुस्सा और कभी दुलार लिए
घर से जुड़ी माँ सब जगह होती है
अभी बाजार, अभी मंदिर
अभी बच्चों का स्कूल
माँ वैसी ही रहती है
कभी बड़ी नहीं होती
पर सब जगह माँ होती है


सब जगह तो ईश्वर भी है
फिर ईश्वर क्यों नहीं हुआ अभी तक
माँ जैसा --------------

फिर किसी रोज



फिर किसी रोज, तू आकर सताएगी मुझे
इस ख्वाब को अब आखो से जुदा ना कर ! 

कुछ देर ही सही, तेरे प्यार का भरम रहने दे
इन बेबस लहरों को साहिल से जुदा ना कर ! 

सलीब ही सही, ये सजा भी मंजूर है मुझे
मगर अभी, लहू को रगों से जुदा ना कर ! 

डरता हूँ खो जाऊंगा, दुनिया की इस भीड़ मैं 
इस बेरुखी से, खुद को मुझसे जुदा ना कर !

हाताल की आधियाँ उखाड़ फेंकंती "नेगी" को
तू आज तितलियों को तिनको से जुदा ना कर ! 

नेगी  

मेरे ज़ज़बात,


उबलते हैँ मेरे ज़ज़बात, काग़ज़ फ़ड़फ़ड़ाते हैँ।
कलम चलती है तो अल्फ़ाज़ अक्सर बड़बड़ाते हैँ।।

बुरा देखा, सुना लेकिन ज़ेहन मेँ जंग जारी है।
हमेशा होँठ, आँखोँ और कानोँ को चिढ़ाते हैँ।।

सफ़र लंबा, डगर छोटी, मगर चलना ज़रुरी है।
संभलते हैँ वही अक्सर, जो गिरते-लड़खड़ाते हैँ।।

उगलनी है कई बातेँ, सियाही छटपटाती है।
सुनो, इस बूँद के भीतर भी बादल घड़घड़ाते हैँ।।

नेगी 

अपने दिल को पत्थर का बना कर रखना

अपने दिल को पत्थर का बना कर रखना ,
हर चोट के निशान को सजा कर रखना ।

उड़ना हवा में खुल कर लेकिन ,
अपने कदमों को ज़मी से मिला कर रखना ।

छाव में माना सुकून मिलता है बहुत ,
फिर भी धूप में खुद को जला कर रखना ।

उम्रभर साथ तो रिश्ते नहीं रहते हैं ,
यादों में हर किसी को जिन्दा रखना ।

वक्त के साथ चलते-चलते , खो ना जाना ,
खुद को दुनिया से छिपा कर रखना ।

रातभर जाग कर रोना चाहो जो कभी ,
अपने चेहरे को दोस्तों से छिपा कर रखना ।

तुफानो को कब तक रोक सकोगे तुम ,
कश्ती और मांझी का याद पता रखना ।

हर कहीं जिन्दगी एक सी ही होती हैं ,
अपने ज़ख्मों को अपनो को बता कर रखना ।

मन्दिरो में ही मिलते हो भगवान जरुरी नहीं ,
हर किसी से रिश्ता बना कर रखना ।

मरना जीना बस में कहाँ है अपने ,
हर पल में जिन्दगी का लुफ्त उठाये रखना ।

दर्द कभी आखरी नहीं होता ,
अपनी आँखों में अश्को को बचा कर रखना ।

Negi