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Friday, April 8, 2011

फिर किसी रोज



फिर किसी रोज, तू आकर सताएगी मुझे
इस ख्वाब को अब आखो से जुदा ना कर ! 

कुछ देर ही सही, तेरे प्यार का भरम रहने दे
इन बेबस लहरों को साहिल से जुदा ना कर ! 

सलीब ही सही, ये सजा भी मंजूर है मुझे
मगर अभी, लहू को रगों से जुदा ना कर ! 

डरता हूँ खो जाऊंगा, दुनिया की इस भीड़ मैं 
इस बेरुखी से, खुद को मुझसे जुदा ना कर !

हाताल की आधियाँ उखाड़ फेंकंती "नेगी" को
तू आज तितलियों को तिनको से जुदा ना कर ! 

नेगी  

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