माँ सभी शब्दों का सार
या फिर शब्दकोश से भी बाहर
की कोई बेहद आत्मीय ध्वनि
जो बार बार मुँह से निकल आता है
और जो समझती है
हर पीड़ा को, हर दु:ख को
माँ-धरती है
जो अपनी छाती पर उगाती है
जीवन को
और उड़ेल कर दे देती है
अपने भीतर से सब कुछ
लो, ये तुम्हारे लिए है
तुम जियो और फलो-फूलो
मैं तुम्हारी माँ हूँ
माँ-घर की छत है
धूप-छाँव और बारिश से लड़ती छत
रिश्तों को गांठ लगाए
बाँध कर रखती है सीमाओं में
आखिर माँ ही तो आंगन है
माँ रसोई भी तो है
इस चिंता में जागती है
कहीं कोई भूखा तो नहीं है
माँ सब जगह है
आंगन में झाड़ू लगाती
गमलों में पानी देती
कपड़े धोती, कपड़े सिलती
रसोई की खटर-पटर में उलझी
खर्चे-पानी के हिसाब में डूबी
बच्चों के बालों को संवारती
किताबों के प्रश्नों और उत्तरों
को फिर से जीती
कभी गुस्सा और कभी दुलार लिए
घर से जुड़ी माँ सब जगह होती है
अभी बाजार, अभी मंदिर
अभी बच्चों का स्कूल
माँ वैसी ही रहती है
कभी बड़ी नहीं होती
पर सब जगह माँ होती है
सब जगह तो ईश्वर भी है
फिर ईश्वर क्यों नहीं हुआ अभी तक
माँ जैसा --------------
या फिर शब्दकोश से भी बाहर
की कोई बेहद आत्मीय ध्वनि
जो बार बार मुँह से निकल आता है
और जो समझती है
हर पीड़ा को, हर दु:ख को
माँ-धरती है
जो अपनी छाती पर उगाती है
जीवन को
और उड़ेल कर दे देती है
अपने भीतर से सब कुछ
लो, ये तुम्हारे लिए है
तुम जियो और फलो-फूलो
मैं तुम्हारी माँ हूँ
माँ-घर की छत है
धूप-छाँव और बारिश से लड़ती छत
रिश्तों को गांठ लगाए
बाँध कर रखती है सीमाओं में
आखिर माँ ही तो आंगन है
माँ रसोई भी तो है
इस चिंता में जागती है
कहीं कोई भूखा तो नहीं है
माँ सब जगह है
आंगन में झाड़ू लगाती
गमलों में पानी देती
कपड़े धोती, कपड़े सिलती
रसोई की खटर-पटर में उलझी
खर्चे-पानी के हिसाब में डूबी
बच्चों के बालों को संवारती
किताबों के प्रश्नों और उत्तरों
को फिर से जीती
कभी गुस्सा और कभी दुलार लिए
घर से जुड़ी माँ सब जगह होती है
अभी बाजार, अभी मंदिर
अभी बच्चों का स्कूल
माँ वैसी ही रहती है
कभी बड़ी नहीं होती
पर सब जगह माँ होती है
सब जगह तो ईश्वर भी है
फिर ईश्वर क्यों नहीं हुआ अभी तक
माँ जैसा --------------

